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हमारे देश को आजाद हुए 68 साल हो गए लेकिन हम अभी भी गुलाम के गुलाम ही हैं। इसका प्रमाण है- हमारी शिक्षा पद्धति! आज तक देश में जितनी भी सरकारें बनी हैं, उन सबने अंग्रेजी की गुलामी की और वे सब घर बैठ गईं।  आज भी हिंदुस्तान में चिकित्सा और कानून की पढ़ाई सिर्फ अंग्रेजी में होती है। 2011 में भोपाल में मुख्यमंत्री शिवराज चैहान ने साहस किया और अटलबिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय कायम किया।

सर संघचालक सुदर्शनजी और मेरे आग्रह पर यह विश्वविद्यालय बना तो दिया गया लेकिन चार साल बीत गए, अभी तक वहां चिकित्सा याने मेडिकल की पढ़ाई हिंदी में शुरु नहीं हुई हैं। क्यों नहीं हुई है? क्योंकि ‘मेडिकल कौंसिल आफ इंडिया’ इसकी अनुमति नहीं देती है। बेचारे उप-कुलपति डॉ. मोहनलाल छीपा क्या करें? वे कौंसिल को लिख-लिखकर थक गए हैं। कौंसिल जो लचर-पचर बहाने बनाती है, उनमें तर्कसम्मत एक बहाना भी नहीं हैं। इस समय डॉ. छीपा के अनुसार पढ़ाने के लिए चिकित्सा-शास्त्र की 300 पुस्तकें उपलब्ध हैं। इसके अलावा देश में हजारों हिंदीभाषी डाक्टर ऐसे हैं, जो सैकड़ों अंग्रेजी किताबों के अनुवाद कुछ ही हफ्तों में कर सकते हैं। मूल पुस्तकें भी लिखी जा सकती हैं। किताबों की कमी का रोना ऐसा ही है, जैसा यह कहना कि हम पहले तैरना सीख लें, फिर पानी में उतरेंगे। पहले हिंदी में मेडिकल की पढ़ाई तो शुरु कीजिए, किताबों का ढेर अपने आप लग जाएगा। स्वास्थ्य मंत्री से मैं अनुरोध करुंगा कि वे मेडिकल कौंसिल को समझाएं और अगर वह न समझे तो उसे तत्काल बर्खास्त करें।

दुनिया के सब बड़े देशों में मेडिकल की पढ़ाई उनकी अपनी भाषा में होती है, सिर्फ अंग्रेज के पुराने गुलाम देशों को छोड़कर। भारत के 54 प्रतिशत डॉक्टर विदेश क्यों भाग जाते हैं? हमारे डॉक्टर गांवों में जाने से क्यों कतराते हैं? डॉक्टरी की पढ़ाई और धंधे में लूट-पाट क्यों मची हुई है? चिकित्सा की हमारी प्रणालियों की उपेक्षा क्यों हो रही है? देश के ग्रामीणों, गरीब और पिछड़ों के बच्चे डाक्टर क्यों नहीं बन पाते हैं? दवाइयां इतनी मंहगी क्यों होती जा रही हैं? इन सब प्रश्नों का जवाब सिर्फ एक ही है। मेडिकल की पढ़ाई अंग्रेजी में तत्काल बंद हो। विदेशी भाषाओं में होनेवाले शोध-कार्यों का फायदा हम जरुर उठाएं लेकिन अपने देश की चिकित्सा पढ़ाई और चिकित्सा-सेवा अपनी भाषा में ही हो। ( सभार : भड़ास4मीडिया )

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